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Saturday, 28 March 2015

अध्याय 6 श्लोक 6 - 45 , BG 6 - 45 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 6 श्लोक 45

और जब योगी कल्मष से शुद्ध होकर सच्ची निष्ठा से आगे प्रगति करने का प्रयास करता है, तो अन्ततोगत्वा अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात् सिद्धि-लाभ करके वह परम गन्तव्य को प्राप्त करता है |



अध्याय 6 : ध्यानयोग

श्लोक 6 . 45



प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संश्रुद्धकिल्बिषः |

अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् || ४५ ||
भावार्थ

और जब योगी कल्मष से शुद्ध होकर सच्ची निष्ठा से आगे प्रगति करने का प्रयास करता है, तो अन्ततोगत्वा अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात् सिद्धि-लाभ करके वह परम गन्तव्य को प्राप्त करता है |


 तात्पर्य



सदाचारी, धनवान या पवित्र कुल में उत्पन्न पुरुष योगाभ्यास के अनुकूल परिस्थिति से सचेष्ट हो जाता है | अतः वह दृढ संकल्प करके अपने अधूरे कार्य को करने में लग जाता है और इस प्रकार वह अपने को समस्त भौतिक कल्मष से शुद्ध कर लेता है | समस्त कल्मष से मुक्त होने पर उसे परम सिद्धि-कृष्णभावनामृत – प्राप्त होती है | कृष्णभावनामृत ही समस्त कल्मष से मुक्त होने की पूर्ण अवस्था है | इसकी पुष्टि भगवद्गीता में (७.२८) हुई है –

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् |
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ||

“अनेक जन्मों तक पुण्यकर्म करने से जब कोई समस्त कल्मष तथा मोहमय द्वन्द्वों से पूर्णतया मुक्त हो जाता है, तभी वह भगवान् की दिव्य प्रेमभक्ति में लग पता है |”





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