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Saturday, 7 March 2015

अध्याय 6 श्लोक 6 - 28 , BG 6 - 28 Bhagavad Gita As It Is Hindi



 अध्याय 6 श्लोक 28

इस प्रकार योगाभ्यास में निरन्तर लगा रहकर आत्मसंयमी योगी समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है और भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में परमसुख प्राप्त करता है |




अध्याय 6 : ध्यानयोग

श्लोक 6 . 28

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः |
       सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्र्नुते || २८ ||




युञ्जन् योगाभ्यास में प्रवृत्त होना; एवम् इस प्रकार; सदा सदैव; आत्मानम् स्व, आत्मा को; योगी योगी जो परमात्मा के सम्पर्क में रहता है; विगत मुक्त; कल्मषः सारे भौतिक दूषण से; सुखेन दिव्यसुख से; ब्रह्म-संस्पर्शम् ब्रह्म के सान्निध्य में रहकर; अत्यन्तम् सर्वोच्च; सुखम् सुख को; अश्नुते प्राप्त करता है |


भावार्थ

इस प्रकार योगाभ्यास में निरन्तर लगा रहकर आत्मसंयमी योगी समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है और भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में परमसुख प्राप्त करता है |

 तात्पर्य


आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है – भगवान् के सम्बन्ध में अपनी स्वाभाविक स्थिति को जानना | जीव (आत्मा) भगवान का अंश है और उसकी स्थिति भगवान् की दिव्यसेवा करते रहना है | ब्रह्म के साथ यह दिव्य सान्निध्य ही ब्रह्म-संस्पर्श कहलाता है |



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