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Sunday, 20 December 2015

अध्याय 9 श्लोक 9 - 32 , BG 9 - 32 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 9 श्लोक 32
हे पार्थ! जो लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे भले ही निम्नजन्मा स्त्री, वैश्य (व्यापारी) तथा शुद्र (श्रमिक) क्यों न हों, वे परमधाम को प्राप्त करते हैं |



अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान

श्लोक 9 . 32



मांहिपार्थव्यपाश्रित्ययेSपिस्यु: पापयोनयः |
स्त्रियोवैश्यास्तथा शुद्रास्तेSपियान्तिपरांगतिम् || ३२ ||




माम् – मेरी; हि – निश्चय ही; पार्थ – हे पृथापुत्र; व्यपाश्रित्य – शरण ग्रहण करके; ये – जो; अपि – भी; स्युः – हैं; पाप-योनयः – निम्नकुल में उत्पन्न; स्त्रियः – स्त्रियाँ; वैश्याः – वणिक लोग; तथा – भी; शूद्राः – निम्न श्रेणी के व्यक्ति; ते अपि – वे भी; यान्ति – जाते हैं; पराम् – परम; गतिम् – गन्तव्य को |



भावार्थ



हे पार्थ! जो लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे भले ही निम्नजन्मा स्त्री, वैश्य (व्यापारी) तथा शुद्र (श्रमिक) क्यों न हों, वे परमधाम को प्राप्त करते हैं |

तात्पर्य



यहाँ पर भगवान् ने स्पष्ट कहा है कि भक्ति में उच्च तथा निम्न जाती के लोगों का भेद नहीं होता | भौतिक जीवन में ऐसा विभाजन होता है, किन्तु भगवान् की दिव्य भक्ति में लगे व्यक्ति पर यह लागू नहीं होता | सभी परमधाम के अधिकारी हैं | श्रीमद्भागवत में (२.४.१८) कथन है कि अधम योनी चाण्डाल भी शुद्ध भक्त के संसर्ग से शुद्ध हो जाते हैं | अतः भक्ति तथा शुद्ध भक्त द्वारा पथप्रदर्शन इतने प्रबल हैं कि वहाँ ऊँचनीच का भेद नहीं रह जाता और कोई भी इसे ग्रहण कर सकता है | शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण करके सामान्य से सामान्य व्यक्ति शुद्ध हो सकता है | प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार मनुष्यों को सात्त्विक (ब्राह्मण), रजोगुणी (क्षत्रिय) तथा तामसी (वैश्य तथा शुद्र) कहा जाता है | इनसे भी निम्न पुरुष चाण्डाल कहलाते हैं और वे पापी कुलों में जन्म लेते हैं | सामान्य रूप से उच्चकुल वाले इन निम्नकुल में जन्म लेने वालों की संगति नहि८न करते | किन्तु भक्तियोग इतना प्रबल होता है कि भगवद्भक्त समस्त निम्नकुल वाले व्यक्तियों को जीवन की परं सिद्धि प्राप्त करा सकते हैं | यह तभी सम्भव है जब कोई कृष्ण की शरण में जाये | जैसा कि व्यपाश्रित्य शब्द से सूचित है, मनुष्य को पूर्णतया कृष्ण की शरण ग्रहण करनी चाहिए | तब वह बड़े से बड़े ज्ञानी तथा योगी से भी महान बन सकता है |




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