Translate

Sunday, 20 December 2015

अध्याय 9 श्लोक 9 - 31 , BG 9 - 31 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 9 श्लोक 31
वह तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है | हे कुन्तीपुत्र! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है |



अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान

श्लोक 9 . 31




क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्र्वच्छान्तिं निगच्छति |
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति || ३१ ||




क्षिप्रम् – शीघ्र; भवति – बन जाता है; धर्म-आत्मा – धर्मपरायण; शश्र्वत-शान्तिम् – स्थायी शान्ति को; निगच्छति – प्राप्त करता है; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; प्रतिजानीहि – घोषित कर दो; – कभी नहीं; मे – मेरा; भक्तः – भक्त; प्रणश्यति – नष्ट होता है |



भावार्थ



वह तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है | हे कुन्तीपुत्र! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है |


तात्पर्य





इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं लगाना चाहिए | सातवें अध्याय में भगवान् कहते हैं कि जो दुष्कृती है, वह भगवद्भक्त नहीं हो सकता | जो भगवद्भक्त नहीं है, उसमें कोई भी योग्यता नहीं होती | तब प्रश्न यह उठता है कि संयोगवश या स्वेच्छा से निन्दनीय कर्मों में प्रवृत्त होने वाला व्यक्ति किस प्रकार भक्त हो सकता है ? यह प्रश्न ठीक ही है | जैसा कि सातवें अध्याय में कहा गया है, जो दुष्टात्मा कभी भक्ति के पास नहीं फटकता, उसमें कोई सद्गुण नहीं होते | श्रीमद्भागवत में भी इसका उल्लेख है | सामान्यतया नौ प्रकार के भक्ति-कार्यों में युक्त रहने वाला भक्त अपने हृदय में बसाता है, फलतः उसके सारे पापपूर्ण कल्मष धुल जाते हैं | निरन्तर भगवान् का चिन्तन करने से वह स्वतः शुद्ध हो जाता है | वेदों के अनुसार ऐसा निधान है कि यदि कोई अपने उच्चपद से नीचे गिर जाता है तो अपनी शुद्धि के लिए उसे कुछ अनुष्ठान करने होते हैं | किन्तु यहाँ पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है, क्योंकि शुद्धि की क्रिया भगवान् का निरन्तर स्मरण करते रहने से पहले ही भक्त के हृदय में चलति रहती है | अतः हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे – इस मन्त्र का अनवरत जप करना चाहिए | यह भक्त को आकस्मिक पतन से बचाएगा | इस प्रकार वह समस्त भौतिक कल्मषों से सदैव मुक्त रहेगा |



1  2  3  4  5  6  7  8  9  10

11  12  13  14  15  16  17  18  19  20

21  22  23  24  25  26  27  28  29  30

31  32  33  34






<< © सर्वाधिकार सुरक्षित भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट >>



Note : All material used here belongs only and only to BBT .
For Spreading The Message Of Bhagavad Gita As It Is 
By Srila Prabhupada in Hindi ,This is an attempt to make it available online , 
if BBT have any objection it will be removed .

No comments:

Post a Comment