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Monday, 22 July 2013

अध्याय 4 श्लोक 4 - 20 , BG 4 - 20 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 20

अपने कर्मफलों की सारी आसक्ति को त्याग कर सदैव संतुष्ट तथा स्वतन्त्र रहकर वह सभी प्रकार के कार्यों में व्यस्त रहकर भी कोई सकाम कर्म नहीं करता |






अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 20





त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्य तृप्तो निराश्रयः |
कर्मण्यभिप्रवृत्तोSपि नैव किञ्चित्करोति सः || २० ||




त्यक्त्वा – त्याग कर; कर्म-फल-आसङ्गम् – कर्मफल की आसक्ति; नित्य – सदा; तृप्तः – तृप्त; निराश्रयः – आश्रयरहित; कर्मणि – कर्म में; अभिप्रवृत्तः – पूर्ण तत्पर रह कर; अपि – भी; – नहीं; एव – निश्चय ही; किञ्चित् – कुछ भी; करोति – करता है; सः – वह |
 
भावार्थ


अपने कर्मफलों की सारी आसक्ति को त्याग कर सदैव संतुष्ट तथा स्वतन्त्र रहकर वह सभी प्रकार के कार्यों में व्यस्त रहकर भी कोई सकाम कर्म नहीं करता |

 तात्पर्य



कर्मों के बन्धन से इस प्रकार की मुक्ति तभी सम्भव है, जब मनुष्य कृष्णभावनाभावित होकर कर कार्य कृष्ण के लिए करे | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् के शुद्ध प्रेमवश ही कर्म करता है, फलस्वरूप उसे कर्मफलों के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहता | यहाँ तक कि उसे अपने शरीर-निर्वाह के प्रति भी कोई आकर्षण नहीं रहता, क्योंकि वह पूर्णतया कृष्ण पर आश्रित रहता है | वह न तो किसी वस्तु को प्राप्त करना चाहता है और न अपनी वस्तुओं की रक्षा करना चाहता है | वह अपनी पूर्ण सामर्थ्य से अपना कर्तव्य करता है और कृष्ण पर सब कुछ छोड़ देता है | ऐसा अनासक्त व्यक्ति शुभ-अशुभ कर्मफलों से मुक्त रहता है | अतः कृष्णभावनामृत से रहित कोई भी कार्य करता पर बन्धनस्वरूप होता है और विकर्म का यही असली रूप है, जैसा कि पहले बताया जा चुका है |




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