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Tuesday, 8 March 2016

अध्याय 11 श्लोक 11 - 12 , BG 11 - 12 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 11 श्लोक 12
यदि आकाश में हजारों सूर्य एकसाथ उदय हों, तो उनका प्रकाश शायद परमपुरुष के इस विश्र्वरूप के तेज की समता कर सके |



अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .12



दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता |
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः || १२ ||





दिवि – आकाश में; सूर्य – सूर्य का; सहस्त्रस्य – हजारों; भवेत् – थे; युगपत् – एकसाथ; उत्थिता – उपस्थित; यदि – यदि; भाः – प्रकाश; सदृशी – के समान; सा – वह; स्यात् – हो; भासः – तेज; तस्य – उस; महात्मनः – परम स्वामी का |


भावार्थ

यदि आकाश में हजारों सूर्य एकसाथ उदय हों, तो उनका प्रकाश शायद परमपुरुष के इस विश्र्वरूप के तेज की समता कर सके |


तात्पर्य





अर्जुन ने जो कुछ देखा वह अकथ्य था, तो भी संजय धृतराष्ट्र को उस महान दर्शन का मानसिक चित्र उपस्थित करने का प्रयत्न कर रहा है | न तो संजय वहाँ था, न धृतराष्ट्र, किन्तु व्यासदेव के अनुग्रह से संजय सारी घटनाओं को देख सकता है | अतएव इस स्थिति की तुलना वह एक काल्पनिक घटना (हजारों सूर्यों) से कर रहा है, जिससे इसे समझा जा सके |








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