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Saturday, 16 January 2016

अध्याय 10 श्लोक 10 - 14 , BG 10 - 14 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 10 श्लोक 14
हे कृष्ण! आपने मुझसे जो कुछ कहा है, उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ | हे प्रभु! न तो देवतागण, न असुरगण ही आपके स्वरूप को समझ सकते हैं |



अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

श्लोक 10 . 14




सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव |
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः || १४ ||




सर्वम् – सब; एतत् – इस; ऋतम् – सत्य को; मन्ये – स्वीकार करता हूँ; यत् – जो; माम् – मुझको; वदसि – कहते हो; केशव – हे कृष्ण; – कभी नहीं; हि – निश्चय ही; ते – आपके; भगवान् – हे भगवान्; व्यक्तिम् – स्वरूप को; विदुः – जान सकते हैं; देवाः – देवतागण; – न तो; दानवाः – असुरगण |

भावार्थ


हे कृष्ण! आपने मुझसे जो कुछ कहा है, उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ | हे प्रभु! न तो देवतागण, न असुरगण ही आपके स्वरूप को समझ सकते हैं |


तात्पर्य




यहाँ पर अर्जुन इसकी पुष्टि करता है कि श्रद्धाहीन तथा आसुरी प्रकृति वाले लोग कृष्ण को नहीं समझ सकते | जब देवतागण तक उन्हें नहीं समझ पाते तो आधुनिक जगत् के तथाकथित विद्वानों का क्या कहना ? भगवत्कृपा से अर्जुन समझ गया कि परमसत्य कृष्ण हैं और एव सम्पूर्ण हैं | अतः हमें अर्जुन के पथ का अनुसरण करना चाहिए | उसे भगवद्गीता का प्रमाण प्राप्त था | जैसा कि भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में कहा गया है , भगवद्गीता के समझने की गुरु-परम्परा का ह्रास हो चुका था, अतः कृष्ण ने अर्जुन से उसकी पुनःस्थापना की, क्योंकि वे अर्जुन को अपना परम प्रिय सखा तथा भक्त समझते थे | अतः जैसा कि गीतोपनिषद् की भूमिका में हमने कहा है, भगवद्गीता का ज्ञान परम्परा-विधि से प्राप्त करना चाहिए | परम्परा-विधि के लुप्त होने पर उसके सूत्रपात के लिए अर्जुन को चुना गया | हमें चाहिए कि अर्जुन का हम अनुसरण करें, जिसने कृष्ण की सारी बातें जान लीं | तभी हम भगवद्गीता के सार को समझ सकेंगे और तभी कृष्ण को भगवान् रूप में जान सकेंगे |


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