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Saturday, 17 October 2015

अध्याय 8 श्लोक 8 - 4 , BG 8 - 4 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 8 श्लोक 4
हे देहधारियों में श्रेष्ठ! निरन्तर परिवर्तनशील यह भौतिक प्रकृति अधिभूत (भौतिक अभिव्यक्ति) कहलाती है | भगवान् का विराट रूप, जिसमें सूर्य तथा चन्द्र जैसे समस्त देवता सम्मिलित हैं, अधिदैव कहलाता है | तथा प्रत्येक देहधारी के हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित मैं परमेश्र्वर (यज्ञ का स्वामी) कहलाता हूँ |



अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति

श्लोक 8 . 4



अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्र्चाधिदैवतम् | 
अधियज्ञोSहमेवात्र देहे देहभृतां वर || ४ ||




अधिभूतम् – भौतिक जगत्; क्षरः – निरन्तर परिवर्तनशील; भावः – प्रकृति; पुरुषः – सूर्य, चन्द्र जैसे समस्त देवताओं सहित विराट रूप; – तथा; अधिदैवतम् – अधिदैव नामक; अधियज्ञः – परमात्मा; अहम् – मैं (कृष्ण); एव – निश्चय ही; अन्न – इस; देहे – शरीर में; देह-भृताम् – देहधारियों में; वर – हे श्रेष्ठ |

भावार्थ

हे देहधारियों में श्रेष्ठ! निरन्तर परिवर्तनशील यह भौतिक प्रकृति अधिभूत (भौतिक अभिव्यक्ति) कहलाती है | भगवान् का विराट रूप, जिसमें सूर्य तथा चन्द्र जैसे समस्त देवता सम्मिलित हैं, अधिदैव कहलाता है | तथा प्रत्येक देहधारी के हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित मैं परमेश्र्वर (यज्ञ का स्वामी) कहलाता हूँ |

तात्पर्य



यह भौतिक प्रकृति निरन्तर परिवर्तित होती रहती है | सामान्यतः भौतिक शरीरों को छह अवस्थाओं से निकलना होता है – वे उत्पन्न होते हैं, बढ़ते हैं, कुछ काल तक रहते हैं, कुछ गौण पदार्थ उत्पन्न करते हैं, क्षीण होते हैं और अन्त में विलुप्त हो जाते हैं | यह भौतिक प्रकृति अधिभूत कहलाती है | यह किसी निश्चित समय में उत्पन्न की जताई है और किसी निश्चित समय में विनष्ट कर दी जाती है | परमेश्र्वर का विराट स्वरूप की धारणा, जिसमें सारे देवता तथा उनके लोक सम्मिलित हैं, अधिदैवत कहलाती है | प्रत्येक शरीर में आत्मा सहित परमात्मा का वास होता है, जो भगवान् कृष्ण का अंश स्वरूप है | यह परमात्मा अधियज्ञ कहलाता है और हृदय में स्थित होता है | इस श्लोक के प्रसंग में एव शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके द्वारा भगवान् बल देकर कहते हैं कि परमात्मा उनसे भिन्न नहीं है | यह परमात्मा प्रत्येक आत्मा के पास आसीन है और आत्मा के कार्यकलापों का साक्षी है तथा आत्मा की विभिन्न चेतनाओं का उद्गम है | यह परमात्मा प्रत्येक आत्मा को मुक्त भाव से कार्य करने की छूट देता है और उसके कार्यों पर निगरानी रखता है | परमेश्र्वर के इन विविध स्वरूपों के सारे कार्य उस कृष्णभावनाभावित भक्त को स्वतः स्पष्ट हो जाते हैं, जो भगवान् की दिव्यसेवा में लगा रहता है | अधिदैवत नामक भगवान् के विराट स्वरूप का चिन्तन उन नवदीक्षितों के लिए है जो भगवान् के परमात्मा स्वरूप तक नहीं पहुँच पाते | अतः उन्हें परामर्श दिया जाता है कि वे उस विराट पुरुष का चिन्तन करें जिसके पाँव अधोलोक हैं, जिसके नेत्र सूर्य तथा चन्द्र हैं औ जिसका सिर उच्च्लोक है |






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