Translate

Sunday, 18 October 2015

अध्याय 8 श्लोक 8 - 27 , BG 8 - 27 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 8 श्लोक 27
हे अर्जुन! यद्यपि भक्तगण इन दोनों मार्गों को जानते हैं, किन्तु वे मोहग्रस्त नहीं होते | अतः तुम भक्ति में सदैव स्थिर रहो |



अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति

श्लोक 8 . 27




नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्र्चन |
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन || २७ ||



– कभी नहीं; एते – इन दोनों; सृती – विभिन्न मार्गों को; पार्थ – हे पृथापुत्र; जानन् – जानते हुए भी; योगी – भगवद्भक्त; मुह्यति – मोहग्रस्त होता है; कश्चन – कोई; तस्मात् – अतः; सर्वेषु कालेषु – सदैव; योग-युक्तः – कृष्णभावनामृत में तत्पर; भव – होवो; अर्जुन – हे अर्जुन |
भावार्थ

हे अर्जुन! यद्यपि भक्तगण इन दोनों मार्गों को जानते हैं, किन्तु वे मोहग्रस्त नहीं होते | अतः तुम भक्ति में सदैव स्थिर रहो |



तात्पर्य


कृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं कि उसे इस जगत् से आत्मा के प्रयाण करने के विभिन्न मार्गों को सुनकर विचलित नहीं होना चाहिए | भगवद्भक्त को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि वह स्वेच्छा से मरेगा या दैववशात् | भक्त को कृष्णभावनामृत में दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर हरे कृष्ण का जप करना चाहिए | उसे यह जान लेना चाहिए कि इन दोनों मार्गों में से किसी की भी चिन्ता करना कष्टदायक है | कृष्णभावनामृत में तल्लीन होने की सर्वोत्तम विधि यही है कि भगवान् की सेवा में सदैव रत रहा जाय | इससे भगवद्धाम का मार्ग स्वतः सुगम, सुनिश्चित तथा सीधा होगा | इस श्लोक का योगयुक्त शब्द विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है | जो योग में स्थिर है, वह अपनी सभी गतिविधियों में निरन्तर कृष्णभावनामृत में रत रहता है | श्री रूप गोस्वामी का उपदेश है – अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः – मनुष्य को सांसारिक कार्यों से अनासक्त रहकर कृष्णभावनामृत में सब कुछ करना चाहिए | इस विधि से, जिसे युक्तवैराग्य कहते हैं, मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है | अतएव भक्त कभी इन वर्णनों से विचलित नहीं होता, क्योंकि वह जानता रहता है कि भक्ति के कारण भगवद्धाम का उसका प्रयाण सुनिश्चित है |






1  2  3  4  5  6  7  8  9  10


11  12  13  14  15  16  17  18  19  20



21  22  23  24  25  26  27  28







<< © सर्वाधिकार सुरक्षित भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट >>



Note : All material used here belongs only and only to BBT .
For Spreading The Message Of Bhagavad Gita As It Is 
By Srila Prabhupada in Hindi ,This is an attempt to make it available online , 
if BBT have any objection it will be removed .

No comments:

Post a Comment